मुंबई 2011 ब्लास्ट केस के आरोपी कफील अहमद अयूब को बॉम्बे हाई कोर्ट से जमानत, जानिए 13 साल बाद क्यों छोड़ा गया

बॉम्बे हाईकोर्ट ने 65 वर्षीय कफील अहमद अयूब को 2011 में जावेरी बाजार, ओपेरा हाउस और दादर कबूतरखाना में हुए तिहरे बम विस्फोट मामले में ज़मानत दे दी। उसके ऊपर आतंकवाद विरोधी कानून – यूएपीए और महाराष्ट्र के संगठित अपराध निरोधक अधिनियम के तहत मुकदमा चल रहा है। हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया।

मुंबई : 2011 के चर्चित मुंबई ट्रिपल ब्लास्ट केस में एक बड़ा फैसला आया है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने 65 वर्षीय कफील अहमद अयूब को जमानत दे दी है। अयूब करीब 14 साल से जेल में बंद था और उस पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम और महाराष्ट्र के मकोका कानून के तहत मुकदमा चल रहा है। जस्टिस ए.एस. गडकरी और जस्टिस आर.आर. भोंसले की बेंच ने यह कहते हुए जमानत दी कि अयूब को ट्रायल से पहले ही एक दशक से ज्यादा वक्त जेल में रखा गया है, जबकि मुकदमे के जल्द पूरा होने की कोई संभावना नजर नहीं आ रही।

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के 2021 के मशहूर ‘के.ए. नजीब केस’ का जिक्र किया। उस केस में कहा गया था कि लंबे समय तक ट्रायल न होने की स्थिति में आरोपी को जमानत देना उसके संवैधानिक अधिकार राइट टू लाइफ और स्पीडी ट्रायल का हिस्सा है।

सरकारी वकील की दलील

अभियोजन पक्ष ने अयूब की ज़मानत याचिका का विरोध करते हुए कहा कि यह विस्फोट 13 जुलाई, 2011 को हुआ था, जिसमें शहर के वित्तीय केंद्र में 21 लोग मारे गए थे और 113 निर्दोष लोग घायल हुए थे। मुंबई पुलिस ने बताया कि शाम 6:55 बजे, ओपेरा हाउस के जेएसएस रोड पर आर्यन हाई स्कूल के पास गश्त कर रहे एक पुलिस इंस्पेक्टर ने एक ज़ोरदार धमाका सुना। पंचरत्न बिल्डिंग के पीछे घटनास्थल पर दौड़कर पहुंचने पर, उन्होंने लोगों को खून से लथपथ देखा। दो अन्य विस्फोट जावेरी बाज़ार और दादर में हुए। शाम का व्यस्त समय था, और तत्कालीन महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने विस्फोटों को “आतंकवादियों द्वारा समन्वित हमला” कहा था, जो 26 नवंबर, 2008 को तीन दिवसीय आतंकी घेराबंदी के बाद से सबसे घातक था।

बिहार से हुआ था गिरफ्तार

मूल तीन एफआईआर 18 जुलाई, 2011 को मुंबई के आतंकवाद निरोधी दस्ते (एटीएस) ने अपने हाथ में ले लीं। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने बिहार निवासी अयूब को 22 फ़रवरी, 2012 को गिरफ़्तार किया और उसे 19 मई, 2012 को बम धमाकों के मामले में पांचवें आरोपी के रूप में गिरफ़्तार दिखाया गया और ट्रांसफर वारंट पर हिरासत में ले लिया गया। उसे आर्थर रोड जेल में रखा गया था।

अहमद अयूब के वकील की दलील

अयूब के वकील मुबीन सोलकर ने भी यही दलील दी थी कि किसी भी आरोपी को अनिश्चितकाल तक जेल में रखना संविधान के खिलाफ है। बता दें कि 13 जुलाई 2011 की शाम मुंबई दहल उठी थी। मुंबई के जवेरी बाजार, ओपेरा हाउस और दादर कबूतरखाना में कुछ ही मिनटों के अंतर पर धमाके हुए थे। भीड़भाड़ के वक्त हुए इन धमाकों में 21 लोगों की मौत हुई थी और 113 से ज्यादा लोग जख्मी हुए थे। तत्कालीन मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने इसे आतंकी साजिश बताया था।

बाद में मुंबई एटीएस ने जांच अपने हाथ में ली और फरवरी 2012 में दिल्ली पुलिस ने बिहार निवासी कफील अहमद अयूब को गिरफ्तार किया था। उस वक्त से वह मुंबई की आर्थर रोड जेल में बंद है।

युवाओं को जिहाद के लिए उकसाने का था आरोप

प्रॉसिक्यूशन का आरोप था कि अयूब ने कथित रूप से कुछ युवाओं को ‘जिहाद’ के लिए उकसाया और मुख्य आरोपी यासीन के साथ मिलकर उसे मदद दी, जबकि अयूब का कहना था कि आरोप अस्पष्ट हैं और कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि उन्हें धमाकों की साजिश की जानकारी थी।

अयूब ने अपनी जमानत अर्जी में कहा कि वह भारत का नागरिक है, फरार होने का कोई इरादा नहीं है और इतने साल जेल में रहने के बाद उन्हें जमानत से वंचित रखना लोकतंत्र और कानून के राज के खिलाफ है। हाईकोर्ट ने सभी पहलुओं को देखते हुए अयूब को जमानत दी है।

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